रेटिंगः 4 स्टार
डायरेक्टरः सौमेंद्र पैढी
कलाकारः मनोज वाजपेयी, मयूर पटोले और तिलोत्तमा शोम
बात 2005-06 की एक है. एक नन्हे बच्चे ने उस समय पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था जब उसने मैराथन दौड़ पूरी की और सबको हैरत में डाल दिया. उसके लिए यह सफर आसान नहीं था. दुनिया भर के झमेले, प्रतिबंध, बच्चे पर अत्याचार की बातें और भी कई आरोप, लेकिन उस बच्चे ने दौड़ पूरी की और दुनिया भर में अपना नाम किया. यह सब वह बच्चा तब कर पाया जब उसके पास वह गुरु था जो उसे अर्जुन बनाने की कूव्वत रखता था.
बुधिया को दौड़ा-दौड़ाकर उन ऊंचाइयों तक पहुंचाया था, जूडो के कोच बिरंची दास ने. इसी कहानी को "बुधिया सिंहः बॉर्न टू रन" का विषय बनाया गया है, और कसे हुए डायरेक्शन, बुधिया और बिरंची की जुगलबंदी की वजह से फिल्म दिल को छूती है. ओलंपिक के इस सीजन में खेल और उससे जुड़ी भावना को समझने के लिए एकदम सटीक फिल्म है.
कहानी में कितना दम:
बुधिया एक गरीब घर का बच्चा है. उसकी मां मजबूर है और वह अपने बच्चे को बेच देती है. लेकिन जूडो कोच, ट्रेनर और अनाथ बच्चों की देख-रेख करने वाले बिरंची दास की नजर बुधिया पर पड़ती है और वह उसको अपनी छत्रछाया में ले लेता है. एक दिन अनजाने में बिरंची दास को बुधिया के हुनर का पता चलता है और उस दिन से वह उसे निखारने की कोशिशें शुरू कर देता है.
स्टार अपील:
बॉलीवुड के डायरेक्टर अक्सर बायोपिक बनाने में ज्यादा हुनर नहीं दिखाते हैं. या तो वह कहानी को जस का तस उतार देते हैं, या फिर उसे बहुत ज्यादा कॉमर्शियल बना देते हैं. लेकिन सौमेंद्र ने असली कहानी को जस का तस दिखाया है लेकिन उसमें फिल्म कला का जबरदस्त छौंक लगाया है.
वह जानते थे कि जिस तरह असल बुधिया को बिरंची दास की जरूरत थी, उसी तरह फिल्म में भी उन्होंने बिरंची के कैरेक्टर को इतना सॉलिड बनाया है कि वह बुधिया के समानांतर क्लासिक लगता है. मनोज बाजपेयी अच्छे किरदार निभाने के लिए जाने जाते हैं लेकिन यह उनके यादगार किरदारों में से एक है. बुधिया के रोल में मयूर ने वाकई अच्छा काम किया है. बाकी सब एक्टर किरदार के मुताबिक ठीक ही हैं.
कमाई की बात:
बायोपिक फिल्मों का बॉलीवुड में एक दौर चल रहा है, लेकिन सौमेंद्र ने जिस तरह से कैरेक्टर गढ़े हैं, फिल्म को क्रिस्पी रखा है वह काबिलेतारीफ है. फिल्म लो बजट है और खेल के इस सीजन में कुछ असली और इंस्पिरेशनल देखने के लिए इस वीकेंड एकदम सही ट्रीट है.
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